चिड़ावा: पिचानवा गांव में संपन्न हुआ मयंक और आयुषी का विवाह दहेज प्रथा के विरुद्ध एक प्रेरणादायी उदाहरण बनकर सामने आया है। बिना तामझाम, बिना दहेज और बिना फिजूलखर्ची के हुआ यह विवाह न केवल पारिवारिक स्तर पर बल्कि पूरे समाज के लिए सकारात्मक सामाजिक संदेश बन गया है। यह आयोजन साबित करता है कि सादगीपूर्ण विवाह, सामाजिक सुधार और बेटियों के सम्मान की दिशा में एक मजबूत कदम हो सकता है।
झुंझुनू जिले के चिड़ावा क्षेत्र के पिचानवा गांव में आयोजित इस विवाह समारोह ने यह संदेश दिया कि विवाह गरिमा और संस्कारों से जुड़ा होता है, न कि दिखावे और खर्च से। इस आयोजन में पारंपरिक भव्यता के स्थान पर सरलता, सामाजिक जिम्मेदारी और संस्कारों को प्राथमिकता दी गई।
इस विवाह की खास बात यह रही कि भव्य कार्यक्रमों से दूर रहते हुए सगाई की रस्म को ही विवाह समारोह का स्वरूप दिया गया। सीमित पारिवारिक उपस्थिति में सादगीपूर्वक विवाह संपन्न हुआ, जिससे अनावश्यक खर्च से बचते हुए दहेज मुक्त विवाह का उदाहरण प्रस्तुत किया गया।
इस प्रेरणादायी निर्णय को साकार करने में सुमेर सिंह चाहर और जयपाल सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। एक शिक्षक के रूप में सुमेर सिंह चाहर ने समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का संकल्प लिया, जबकि सेवानिवृत्त व्याख्याता जयपाल सिंह के अनुभव और मार्गदर्शन से बिना दहेज और बिना दिखावे के विवाह का सर्वसम्मत निर्णय लिया गया।
विवाह समारोह के दौरान जयपाल सिंह चाहर, बलबीर चाहर, रामसिंह डारा, माईधन लांबा और अनिल भांभू सहित परिवार के अन्य वरिष्ठ सदस्य उपस्थित रहे। सभी ने नवदंपति को आशीर्वाद देते हुए सुखद, समृद्ध और आदर्श वैवाहिक जीवन की शुभकामनाएं दीं।
इस विवाह के माध्यम से वर पक्ष ने बिना दहेज और बिना टीका के बहू को स्वीकार कर सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दी। यह संदेश दिया गया कि बेटियां बोझ नहीं, बल्कि परिवार और समाज का सम्मान व आधार होती हैं।
मयंक और आयुषी का यह विवाह दहेज मुक्त विवाह, सादगीपूर्ण शादी, सामाजिक सुधार, महिला सम्मान और खर्च कम करने जैसे मूल्यों को मजबूती देता है। यह आयोजन आने वाली पीढ़ियों को दहेज रहित और सरल विवाह अपनाने के लिए प्रेरित करेगा और समाज में नई सकारात्मक सोच को बढ़ावा देगा।





