केरल: की धरती आज आस्था, इतिहास और संस्कृति के एक अद्भुत पुनर्जागरण की साक्षी बन रही है। उत्तर भारत के कुंभ मेले की तर्ज पर, मलप्पुरम जिले के थिरुनावया में स्थित भरतपुझा नदी के तट पर महामघम महोत्सव 2026 का आज से औपचारिक शुभारंभ हो गया है। करीब 250 वर्षों बाद लौटे इस भव्य धार्मिक आयोजन ने पूरे दक्षिण भारत का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है और इसे केरल की सांस्कृतिक विरासत का पुनर्जन्म माना जा रहा है।
भरतपुझा तट पर आस्था का महासंगम
आज सुबह पहली किरण के साथ ही भरतपुझा नदी के तट पर पवित्र स्नान का सिलसिला शुरू हो गया। मौनी अमावस्या के शुभ अवसर पर जूना अखाड़े के सानिध्य में हजारों श्रद्धालुओं ने नदी में आस्था की डुबकी लगाई। थिरुनावया स्थित नवमुकुंद मंदिर के सामने तर्पण, हवन और विशेष पूजा-अर्चना के साथ महामघम महोत्सव की शुरुआत हुई। मंत्रोच्चार, धूप-दीप और भक्ति संगीत से पूरा वातावरण कुंभ मेले जैसी अनुभूति देने लगा।
250 साल पुरानी परंपरा का पुनर्जीवन
इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि केरल में कभी महा मखम उत्सव उत्तर भारत के कुंभ मेले जितना ही भव्य आयोजन हुआ करता था। समय के साथ यह परंपरा विलुप्त हो गई थी। अब लगभग ढाई सौ वर्षों के बाद जूना अखाड़ा इस ऐतिहासिक परंपरा को दोबारा जीवित कर रहा है। यह आयोजन आज केरल का एकमात्र ऐसा नदी महोत्सव बन गया है, जिसमें देश-विदेश से हिंदू समुदाय के श्रद्धालु भाग ले रहे हैं।
धार्मिक अनुष्ठानों से आगे सांस्कृतिक आंदोलन
महामघम सभापति और महामंडलेश्वर आनंदवनम भारती के अनुसार, यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य केरल की प्राचीन सांस्कृतिक जड़ों को फिर से मुख्यधारा में लाना है। जूना अखाड़े के नेतृत्व में भरतपुझा नदी का तट एक बार फिर उसी वैभव और गौरव का साक्षी बन रहा है, जो सदियों पहले यहां देखने को मिलता था।
3 फरवरी तक चलेगा महामघम महोत्सव
18 जनवरी से शुरू हुआ यह महोत्सव 3 फरवरी 2026 तक चलेगा। 19 जनवरी को नवमुकुंद मंदिर परिसर में केरल के राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर औपचारिक उद्घाटन करेंगे। उसी दिन धर्म ध्वजा फहराई जाएगी, जो सनातन परंपरा, धर्म की विजय और सामाजिक एकता का प्रतीक मानी जाती है। श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनने वाली रथ यात्रा भी इसी क्रम में आयोजित की जाएगी।
दक्षिण भारत में कुंभ जैसी अनुभूति
महामघम महोत्सव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केरल केवल प्राकृतिक सौंदर्य ही नहीं, बल्कि प्राचीन सनातन परंपराओं का भी केंद्र रहा है। भरतपुझा नदी का यह तट आज भक्ति, भाव और विश्वास के उस संगम में तब्दील हो चुका है, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।





