Monday, March 30, 2026
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“डॉक्टर पर भगवान जैसा भरोसा किया, उसने आंख ही छीन ली!” 12 साल बाद मरीज को मिला न्याय, नवलगढ़ के अस्पताल को 6.5 लाख देने होंगे

झुंझुनूं, 25 अक्टूबर: मेडिकल नेग्लिजेंस (Medical Negligence) के एक चौंकाने वाले मामले में झुंझुनूं उपभोक्ता आयोग (Jhunjhunu Consumer Forum) ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। आयोग ने नवलगढ़ स्थित सेठ आनंदराम जयपुरिया नेत्र हॉस्पिटल और डॉ. ईसरत सदानी पर 6.5 लाख रुपये का भारी जुर्माना लगाया है। 12 साल पहले हुए एक गलत ऑपरेशन के कारण मरीज की आंख की रोशनी चली गई थी। आयोग ने इसे “प्रकृति के अनमोल उपहार की हानि” बताते हुए सख्त टिप्पणी की है।

12 साल पुराना मामला: एक ऑपरेशन जिसने छीनी रोशनी

यह मामला सीकर जिले की लक्ष्मणगढ़ तहसील के जोगियों का बास निवासी श्रीराम पुत्र नरायणराम से जुड़ा है। उन्होंने वर्ष 2012 में आंख के उपचार के लिए नवलगढ़ के सेठ आनंदराम जयपुरिया नेत्र हॉस्पिटल में ऑपरेशन करवाया था। आरोप है कि ऑपरेशन के तुरंत बाद मरीज को आंख में असहनीय दर्द, सूजन और दिखाई देने में भारी परेशानी होने लगी। जब लगातार इलाज के बाद भी कोई सुधार नहीं हुआ और मरीज ने वापस उसी चिकित्सक को दिखाया, तो उसे केवल दवाइयां दी गईं। करीब 3 महीने से अधिक समय बीत जाने पर भी जब आंख ठीक नहीं हुई, तो पीड़ित ने झुंझुनूं, पिलानी और सीकर के कई अस्पतालों में दिखाया। अंत में जब उन्होंने जयपुर स्थित एसएमएस अस्पताल में नेत्र विशेषज्ञों से जांच करवाई, तो एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ। डॉक्टरों ने बताया कि आंख में लैंस ही सही नहीं लगाया गया था। आंख की रोशनी जाने पर पीड़ित ने जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग में परिवाद पेश कर न्याय की गुहार लगाई।

अस्पताल के बेतुके तर्क खारिज, 3426 दिन में भी नहीं दे पाए सबूत

आयोग द्वारा तलब किए जाने पर अस्पताल और डॉ. ईसरत सदानी ने अजीबोगरीब तर्क पेश किए। उन्होंने दलील दी कि चिकित्सक को 500 से अधिक ग्लूकोमा सर्जरी और हजारों मोतियाबिंद ऑपरेशन का अनुभव है, और अस्पताल 1942 से स्थापित है। उन्होंने उल्टे मरीज पर ही आरोप मढ़ दिया कि आंख मसलने या समय पर दवाई नहीं लेने से नेत्र ज्योति गई। लेकिन जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के अध्यक्ष मनोज कुमार मील एवं सदस्य प्रमेंद्र कुमार सैनी की बैंच ने इन तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया। आयोग ने पाया कि फॉलो-अप जांच के किसी भी दस्तावेज में मरीज की लापरवाही का कोई जिक्र नहीं था। आयोग ने टिप्पणी की कि अस्पताल और चिकित्सक को अपने अनुभव के दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए 3426 दिनों का लंबा समय दिया गया, लेकिन वे कुछ भी पेश नहीं कर सके।

“आंख प्रकृति का अनमोल उपहार” – आयोग की सख्त टिप्पणी

आयोग ने इस मामले को ‘सेवादोष’ मानते हुए सख्त टिप्पणी की। पीठासीन अधिकारी मनोज कुमार मील ने फैसले में लिखा कि “प्रकृति ने मानव में कोई भेदभाव नहीं करते हुए सभी को 2 आखों का उपहार दिया है… जब एक मानव अपनी पीड़ा लेकर चिकित्सक के पास आता है, तो वह उम्मीदों से भरा रहता है… वह चिकित्सक पर उसी रूप में विश्वास करता है, जिस प्रकार एक सद्भावी व्यक्ति अपने ईष्ट देवता पर करता है।” आयोग ने जोर देकर कहा कि “आंख की क्षति न केवल शारीरिक बल्कि एक प्राकृतिक और अनमोल हानि भी है।” आयोग ने कहा कि इस प्रकरण में माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुस्थापित विधि “परिस्थितियां स्वयं बोलती है” (Res Ipsa Loquitur) का सिद्धांत लागू होता है। आयोग ने अस्पताल और डॉक्टर को 45 दिवस के भीतर 6 लाख 50 हजार रुपये अदा करने का आदेश दिया। इस राशि पर 27 जनवरी 2015 से 6% वार्षिक दर से ब्याज भी देय होगा।

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