चिड़ावा में बारिश से ढहा दो सौ वर्ष पुराना गोगाजी मंदिर का गुंबज, प्राचीन निर्माण शैली उजागर

चिड़ावा: कस्बे के प्रसिद्ध पंडित गणेश नारायण बावलिया बाबा समाधि स्थल स्थित गोगाजी मंदिर के गुंबज का एक हिस्सा शुक्रवार सुबह करीब 9 बजे अचानक ढह गया। गुरुवार देर शाम से हो रही मूसलधार बारिश के चलते यह हादसा हुआ, जिससे क्षेत्रवासियों में आस्था से जुड़ी इस ऐतिहासिक धरोहर की चिंता बढ़ गई है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, मंदिर परिसर में स्थित यह गुंबज अत्यंत प्राचीन है और इसे करीब दो सौ वर्ष पुराना बताया जा रहा है। पारंपरिक निर्माण तकनीकों से बना यह गुंबज मिट्टी के मटकों और चूने से निर्मित था, जो पुराने समय की वास्तुकला और ग्रामीण निर्माण शैली का प्रमाण माना जाता है। गुंबज के गिरने से अब इसकी भीतरी संरचना स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी है, जिससे इसके ऐतिहासिक महत्व और शिल्प की बारीकियों की झलक मिल रही है।

स्थानीय श्रद्धालु सुबह मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए पहुंचे थे, उसी दौरान गुंबज का हिस्सा भरभरा कर गिर पड़ा। सौभाग्यवश हादसे के समय कोई जनहानि नहीं हुई, जिससे लोगों ने राहत की सांस ली। हादसे की सूचना मिलने के बाद स्थानीय प्रशासन और मंदिर समिति के प्रतिनिधि मौके पर पहुंचे और स्थिति का जायजा लिया।

इस घटना के बाद क्षेत्रवासियों ने मांग की है कि गोगाजी मंदिर जैसे ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों की संरक्षा के लिए सरकार व पुरातत्व विभाग की ओर से विशेष प्रयास किए जाएं। उनका कहना है कि यदि समय रहते संरक्षण के उपाय नहीं किए गए तो क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहरें धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगी।

मंदिर के पुजारियों और समिति सदस्यों ने बताया कि गोगाजी मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह क्षेत्रीय पहचान और लोक परंपरा का प्रतीक भी है। मंदिर की प्राचीनता और विशेष निर्माण शैली को देखते हुए इसके पुनरुद्धार व संरक्षण के लिए शीघ्र ही विशेषज्ञों से परामर्श लेकर कार्रवाई की जाएगी।

गौरतलब है कि चिड़ावा और आस-पास के क्षेत्रों में गोगाजी मंदिरों को विशेष मान्यता प्राप्त है, और वर्ष भर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। ऐसे में इस तरह की घटनाएं केवल धरोहरों को नुकसान पहुंचाती हैं, बल्कि लोगों की भावनाओं को भी आहत करती हैं।

यह घटना एक बार फिर दर्शाती है कि ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों के संरक्षण को प्राथमिकता देना समय की आवश्यकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी रह सकें।

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