जयशंकर-जिनपिंग मुलाकात से भारत-चीन रिश्तों में नया मोड़, सीमावर्ती तनाव घटाने पर बनी सहमति, गलवान संघर्ष के बाद पहली उच्चस्तरीय भेंट, द्विपक्षीय संवाद फिर से तेज करने की कोशिश

नई दिल्ली: भारत और चीन के बीच लंबे समय से जमी बर्फ को पिघलाने की दिशा में एक अहम कूटनीतिक पहल हुई है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मंगलवार को बीजिंग में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की। यह मुलाकात जून 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के बाद पहली उच्चस्तरीय राजनीतिक भेंट रही, जिसे दोनों देशों के संबंधों में नया मोड़ माना जा रहा है।

जयशंकर शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के विदेश मंत्रियों की बैठक में भाग लेने बीजिंग पहुंचे हैं। उन्होंने बताया कि इस अवसर पर उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शुभकामनाएं शी जिनपिंग तक पहुंचाईं। साथ ही भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों में हालिया प्रगति की जानकारी भी साझा की। जयशंकर ने कहा कि इस दिशा में शीर्ष नेताओं के मार्गदर्शन को भारत विशेष महत्व देता है।

इस बैठक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि अक्टूबर 2024 में भारत और चीन के बीच डेमचोक और देपसांग क्षेत्रों से सैन्य वापसी को लेकर समझौता हो चुका है। दोनों पक्षों ने यह भी तय किया है कि सीमा विवाद को सुलझाने के लिए आपसी संवाद फिर से सक्रिय किया जाएगा। गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच राजनयिक और सैन्य स्तर की वार्ताएं लगभग ठप हो गई थीं।

इससे एक दिन पहले जयशंकर ने चीन के विदेश मंत्री वांग यी से भी मुलाकात की थी। उस दौरान उन्होंने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तनाव घटाने और आगे ठोस कदम उठाने की आवश्यकता पर बल दिया। जयशंकर ने कहा कि बीते नौ महीनों में दोनों देशों ने संबंध सामान्य करने की दिशा में ठोस प्रगति की है, लेकिन अब जरूरी है कि सीमा पर तनाव से जुड़े बाकी मुद्दों का समाधान निकाला जाए।

उन्होंने चीन से यह भी आग्रह किया कि व्यापारिक सहयोग को बाधित न किया जाए और विशेषकर आवश्यक खनिजों के निर्यात पर किसी प्रकार की रोक न लगाई जाए। जयशंकर ने यह भी कहा कि मतभेदों को कभी भी विवाद का रूप नहीं लेने देना चाहिए और प्रतिस्पर्धा को टकराव में नहीं बदलने देना चाहिए।

यह यात्रा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के जून में चीन के किंगदाओ दौरे के बाद हो रही है। ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व संबंधों को सामान्य करने और स्थिरता की दिशा में आगे बढ़ने को तैयार हैं। इस प्रयास का एक उद्देश्य यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस वर्ष के अंत में चीन में प्रस्तावित एससीओ शिखर सम्मेलन में भाग ले सकें।

हालांकि, भारत-चीन संबंधों के पूरी तरह सामान्य होने में अब भी कुछ प्रमुख अड़चनें बरकरार हैं। इनमें दलाई लामा के उत्तराधिकार का मुद्दा और हाल ही में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा शुरू किए गए ऑपरेशन सिंदूर के संदर्भ में चीन द्वारा पाकिस्तान का समर्थन प्रमुख हैं। इन संवेदनशील मुद्दों को सुलझाए बिना दोनों देशों के संबंधों में पूरी बहाली की राह अभी आसान नहीं दिखती।

फिर भी, जयशंकर और शी जिनपिंग की मुलाकात को भारत-चीन संबंधों के भविष्य की दृष्टि से सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है, जहां संवाद और सहयोग की संभावनाएं फिर से जीवंत होती दिखाई दे रही हैं।

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