बगड़: झुंझुनूं जिले में अनुसूचित जाति समाज के पहले विधायक रहे महादेव प्रसाद बंका की पुण्यतिथि पर बगड़ कस्बे में श्रद्धा और सम्मान का भावपूर्ण संगम देखने को मिला। जोगेंद्र निवास सामुदायिक भवन में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में सामाजिक, शैक्षणिक और प्रशासनिक क्षेत्र से जुड़े लोगों ने उनके योगदान को याद करते हुए उन्हें सामाजिक न्याय और राजनीतिक चेतना का अग्रदूत बताया।

बगड़ स्थित जोगेंद्र निवास सामुदायिक भवन में आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाजबंधु एकत्रित हुए। कार्यक्रम में वक्ताओं ने महादेव प्रसाद बंका के सामाजिक संघर्ष, राजनीतिक दूरदर्शिता और जनसेवा को विस्तार से याद किया। उपस्थित लोगों ने उनके आदर्शों को आत्मसात करने का संकल्प भी लिया।

भीम आर्मी जिलाध्यक्ष विकास आल्हा ने संबोधन में कहा कि जिस दौर में आमजन राजनीति की बुनियादी समझ से भी दूर था, उस समय महादेव प्रसाद बंका ने न केवल राजनीति में कदम रखा बल्कि जिले को राज्य स्तर पर पहचान दिलाई। उन्होंने राजनीति में आने से पूर्व सेना में सेवा देकर अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया, जो उनके सार्वजनिक जीवन में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता रहा।

कार्यक्रम में बलबीर काला ने महादेव प्रसाद बंका के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे देशभर में एक सशक्त नेता के रूप में पहचाने जाते थे। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समाज के लिए वे मार्गदर्शक की भूमिका में रहे। विधायक रहते हुए उन्होंने शिक्षा, सामाजिक सम्मान और अधिकारों के लिए निरंतर प्रयास किए, जिससे समाज को राजनीतिक मजबूती मिली।

श्रद्धांजलि सभा में बुद्ध विहार ट्रस्टी बलबीर काला, महावीर सरपंच खुडाना, डॉक्टर जगदीश बरवड़, सेवानिवृत्त निरंजन प्रसाद आल्हा, पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष सतवीर बरवड़, पूर्व सरपंच बनवारी गोठवाल कासिमपुरा, पूर्व नगर पालिका उपाध्यक्ष रामलाल चंदेलिया, एईएन रामप्रताप बरवड़, प्रधानाचार्य पवन कुमार बुंदेला और उपप्रधानाचार्य बलबीर बुंदेला मौजूद रहे।

इसके साथ ही नर्सिंग ऑफिसर विकास आल्हा, नीरज आल्हा, सेवानिवृत्त व्याख्याता करणीराम बरवड़, मालीराम निर्मल, चतुरुराम आल्हा, सुनील बुंदेला, बनवारी लाल फुलवारिया, जोगेंद्र, राहुल, आकाश, मुकेश, राजेश गोठवाल, सुनील, तपेंद्र, धर्मपाल आल्हा और जयसिंह आल्हा सहित बड़ी संख्या में नागरिकों ने श्रद्धांजलि अर्पित की।

वक्ताओं ने कहा कि महादेव प्रसाद बंका की राजनीतिक विरासत आज भी सामाजिक चेतना का स्रोत है। उनका जीवन संघर्ष, आत्मसम्मान और समानता के मूल्यों का प्रतीक रहा है, जिसे आगे बढ़ाना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

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