नई दिल्ली: भारत में वायु प्रदूषण अब मौसमी समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह एक गंभीर जनस्वास्थ्य आपातकाल का रूप ले चुका है। इसके बावजूद वर्ष 2026–27 के केंद्रीय बजट में प्रदूषण नियंत्रण को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं दी गई। केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और नगर निगम — तीनों जगह भारतीय जनता पार्टी की सरकार होने के बाद भी दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर 700 के पार पहुंच गया। इसके बावजूद बजट में न तो ठोस योजना दिखी और न ही स्वच्छ हवा के अधिकार को लेकर गंभीरता नजर आई।
सत्ता एक, जिम्मेदारी तय नहीं — फिर भी 700 पार पहुंचा प्रदूषण
पहले केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप चलते थे, लेकिन अब केंद्र, दिल्ली सरकार और नगर निगम तीनों में एक ही पार्टी की सत्ता है। इसके बावजूद सर्दियों के इस मौसम में दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के कई इलाकों में वायु गुणवत्ता स्तर 700 के पार चला गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सरकार की ओर से न तो किसी विभाग ने जिम्मेदारी ली और न ही कोई ठोस जवाब सामने आया।
प्रदूषण बजट 2026 में कटौती, स्वच्छ हवा के अधिकार को झटका
वर्ष 2026–27 के बजट में प्रदूषण नियंत्रण के लिए केवल 1,091 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जबकि पिछले वर्ष यह राशि 1,300 करोड़ रुपये थी। बिगड़ते हालात के बीच बजट में की गई यह कटौती यह संकेत देती है कि सरकार अभी भी वायु प्रदूषण को गंभीर जनस्वास्थ्य संकट के रूप में नहीं देख रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह स्वच्छ हवा के अधिकार की भावना के विपरीत है।
पहले पैसा था, खर्च ही नहीं हुआ
वर्ष 2024–25 में प्रदूषण नियंत्रण के लिए 858 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था, लेकिन संसदीय समिति से स्वीकृति न मिलने के कारण केवल 16 करोड़ रुपये ही खर्च किए जा सके। यह कुल बजट का 1% से भी कम था, जो सरकारी व्यवस्था की कार्यक्षमता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
हर साल 20 लाख मौतें, फिर भी बजट नाकाफी
वैश्विक वायु स्थिति रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल 20 लाख से अधिक लोगों की मौत केवल जहरीली हवा के कारण होती है। दिल्ली में ही 21,262 लोगों की मौत सांस से जुड़ी बीमारियों से हुई, जिनका कारण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वायु प्रदूषण रहा। रिपोर्ट यह भी बताती है कि पूरी दुनिया में रोजाना लगभग 2 हजार बच्चे जहरीली हवा में सांस लेने से जान गंवाते हैं, जिनमें बड़ी संख्या भारत की है।
सरकारी आंकड़े भी खतरे की पुष्टि करते हैं
जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार नगर निगम, नई दिल्ली नगर परिषद और अन्य संस्थाओं के अंतर्गत चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित मौतों में से 10% मौतें सांस से संबंधित बीमारियों के कारण हुईं। इनकी संख्या लगभग 90,883 बताई गई है, जो हालात की भयावहता को साफ दर्शाती है।
पर्यावरण मंत्रालय का बढ़ा बजट, लेकिन सवाल बरकरार
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को वर्ष 2026 में 3,759.46 करोड़ रुपये का बजट मिला है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 8% अधिक है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह बढ़ोतरी जरूरत के हिसाब से बेहद कम है। असली स्थिति आने वाली सर्दियों में सामने आएगी, जब यह स्पष्ट होगा कि यह राशि कहां और कैसे खर्च की गई।
भारत के जहरीली हवा वाले शहर, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं
दुनिया के 50 सबसे प्रदूषित शहरों में बड़ी संख्या भारत के शहरों की है। इनमें दिल्ली, फरीदाबाद, गुरुग्राम, गाजियाबाद, सोनीपत, ग्रेटर नोएडा, नोएडा, ग्वालियर, गंगापुर, चरखी दादरी, मेरठ और कानपुर जैसे शहर शामिल हैं। इसके बावजूद न तो राज्य सरकारों की ओर से और न ही केंद्र सरकार की तरफ से कोई ठोस और स्थायी समाधान नजर आता है।
पैसा खर्च होता है, लेकिन असर नहीं दिखता
पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी बजट का बड़ा हिस्सा संस्थागत ढांचे, कार्यालयों, कर्मचारियों के वेतन और जागरूकता अभियानों पर खर्च किया जाता है। वनस्पति सर्वेक्षण संस्थान, प्राणी सर्वेक्षण संस्थान और राष्ट्रीय हरित अधिकरण से जुड़े कार्यालयों पर भारी खर्च के बावजूद जमीनी स्तर पर सुधार दिखाई नहीं देता। हर साल हालात लगभग वही रहते हैं।
स्मॉग गन से कृत्रिम बारिश तक, करोड़ों खर्च फिर भी नाकामी
सरकार ने धुंध नियंत्रक मशीनों, धुंध टावरों और कृत्रिम बारिश जैसे उपायों पर करोड़ों रुपये खर्च किए। इसके बावजूद वर्ष 2025 में प्रदूषण ने नए रिकॉर्ड बनाए। दिल्ली और आसपास के कई इलाकों में वायु गुणवत्ता स्तर 700 के पार पहुंचना यह दिखाता है कि स्थानीय प्रशासन एक बार फिर हालात संभालने में विफल रहा।
एयर प्यूरिफायर पर 18% कर, आम आदमी पर दोहरी मार
स्वच्छ हवा के अधिकार की बात करने वाली सरकार ने घरेलू वायु शुद्धिकरण यंत्रों को अब भी 18% वस्तु एवं सेवा कर के दायरे में रखा है। उम्मीद थी कि इस बजट में इन्हें कर मुक्त किया जाएगा, लेकिन इस मोर्चे पर भी आम जनता को राहत नहीं मिली।





