वाशिंगटन, अमेरिका: अमेरिका ने सोमवार को भारत की चार कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिन पर आरोप है कि वे ईरान के तेल एवं पेट्रोकेमिकल उद्योग में कथित रूप से संलिप्त हैं। अमेरिकी वित्त मंत्रालय द्वारा जारी एक बयान के अनुसार, इन कंपनियों में आस्टिनशिप मैनेजमेंट प्रा. लि, बीएसएम मरीन एलएलपी, कासमोस लाइंस इंक और फ्लक्स मैरीटाइम एलएलपी शामिल हैं। इस ताजा कदम के तहत, अमेरिका ने कुल १६ कंपनियों और जहाजों को ईरान के साथ व्यापार संबंधों के लिए प्रतिबंधित किया है।

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अमेरिका का ईरान पर दबाव बनाने का प्रयास

अमेरिका का यह प्रतिबंध ईरान पर दबाव बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है, ताकि वह अपने तेल और पेट्रोकेमिकल उद्योग से होने वाली आय का उपयोग आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने में न कर सके। अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि इन कंपनियों द्वारा ईरान के अवैध शिपिंग नेटवर्क का हिस्सा बनकर ईरानी तेल को एशिया में खरीदारों तक पहुंचाना, अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा था।

इस प्रतिबंध का उद्देश्य ईरान के खिलाफ अमेरिका की अधिकतम दबाव रणनीति को मजबूत करना है, जो ईरान की तेल बिक्री को निशाना बनाते हुए उस पर दबाव डालने का प्रयास कर रहा है। यह कदम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ४ फरवरी को जारी किए गए राष्ट्रीय सुरक्षा ज्ञापन के बाद आया है, जिसका उद्देश्य ईरान के तेल निर्यात को रोकना है।

ईरान की सैन्य गतिविधियों को वित्तपोषित करने की कोशिशों को रोकना

अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने अपने बयान में कहा कि यह प्रतिबंधों का दूसरा दौर है, जो ईरान की आतंकी गतिविधियों को वित्तपोषित करने के प्रयासों को रोकने के लिए लिया गया है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ईरान की कंपनियाँ अवैध रूप से तेल की बिक्री करती हैं, जिससे वह अपनी सैन्य और आतंकवादी गतिविधियों को वित्तपोषित कर रहा है। अमेरिका ने यह भी कहा कि वह ऐसे शिपिंग नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई करेगा, जो ईरान के लिए तेल का परिवहन करने में शामिल हैं, और इस तरह की कार्रवाई लगातार जारी रखेगा।

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यूके ने भी भारतीय कंपनी पर प्रतिबंध लगाया

यूके (यूनाइटेड किंगडम) ने भी सोमवार को रूस के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा प्रतिबंध लगाया, जिसमें भारतीय कंपनी इनसिया इम्पेक्स प्रा. लिमिटेड को शामिल किया गया है। इस कंपनी पर रूस के लिए सैन्य आपूर्ति करने का आरोप है। प्रतिबंध के तहत, रूसी सेना को आपूर्ति किए जाने वाले माइक्रोप्रोसेसर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान बनाने वाली कंपनियों को निशाना बनाया गया है। इन कंपनियों में तुर्की, थाईलैंड, भारत और चीन शामिल हैं। यह कदम यूक्रेन युद्ध के तीन साल पूरे होने के अवसर पर लिया गया है और इसका उद्देश्य रूस की सैन्य शक्ति को कमजोर करना है।

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