Thursday, February 12, 2026
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नवलगढ़ ने खोया अपना जननेता: किसान नेता और पूर्व विधायक नवरंग सिंह जाखड़ का 92 वर्ष की उम्र में निधन

नवलगढ़: विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक रह चुके और राजस्थान किसान मंच के अध्यक्ष नवरंग सिंह जाखड़ का 92 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके बेटे और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी रह चुके रामवतार जाखड़ ने बताया कि दाह संस्कार शुक्रवार सुबह 11 बजे पैतृक गांव धमोरा में होगा। पौत्र दुष्यंत जाखड़ वर्तमान में भारतीय वॉलीबॉल टीम के कप्तान हैं।

शिक्षा से राजनीति तक का सफर

नवरंग सिंह जाखड़ का जन्म 7 जून 1942 को झुंझुनूं जिले के धमोरा गांव में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा जाखड़ों की ढाणी से शुरू होकर बगड़, नवलगढ़ और जयपुर तक जारी रही। उन्होंने एमए (इतिहास) और बीएड की पढ़ाई पूरी की तथा एलएलबी भी शुरू की, लेकिन पूर्ण नहीं कर पाए। 26 मई 1957 को मूंगी देवी से विवाह हुआ। उनके तीन पुत्र रामावतार, संजय और सुनील जाखड़ तथा पुत्री सुमित्रा सिंह आर्य हैं।

छात्र नेता से विधायक तक

विद्यार्थी जीवन से ही वे आजादी और जागीरदारी उन्मूलन के आंदोलनों से जुड़े रहे। 1977 में जनता पार्टी से और 1985 में लोकदल पार्टी से नवलगढ़ से विधायक बने। वे विधानसभा की विशेषाधिकार समिति और गृह समिति के अध्यक्ष रहे तथा 1979–80 में विधानसभा के मुख्य सचेतक बने।

समाज सुधार में अहम योगदान

नवरंग सिंह जाखड़ ने शिक्षा, साक्षरता, दहेज प्रथा, मृत्युभोज, बाल विवाह और पोलियो उन्मूलन जैसे विषयों पर अभियान चलाए। उन्होंने धमोरा में पुस्तकालय और प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम संचालित किए। शराबबंदी, शिक्षकों के आंदोलन और महिला आरक्षण की लड़ाई में वे अग्रिम पंक्ति में रहे। 1987 के दिवराला सती प्रकरण को उन्होंने उजागर किया और राजस्थान में सती प्रथा पर कानून बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

किसान आंदोलनों के थे मजबूत चेहरा

1985 में ओलावृष्टि और सूखे से प्रभावित किसानों के लिए वे विधानसभा में मुखर होकर लड़े। बिजली दरों में बढ़ोतरी के खिलाफ आंदोलन किया और सब्जी व दूध की हड़ताल का नेतृत्व किया। 1986 के किसान आंदोलन में 1 लाख से अधिक किसानों ने गिरफ्तारी दी जिसमें वे भी शामिल रहे। 2003 में आमरण अनशन कर राजस्थान के किसानों के लिए 387 करोड़ रुपये के मुआवजे की व्यवस्था करवाई।

बलिदानियों के सम्मान में सदैव आगे

1962, 1965, 1971 और कारगिल युद्ध के दौरान वे सैनिक परिवारों के साथ खड़े रहे। कारगिल युद्ध में बलिदान हुए सैनिक रामावतार दूत, विजयपाल ढाका, ओमप्रकाश जाखड़, शीशराम गिल, रामप्रताप, राजेंद्र शेखावत, रामजीलाल बडवासी, देवकरण किडवाना, दशरथ यादव, प्रह्लाद सिंह, जय सिंह, बाबूलाल पूनिया और रामनिवास सहू की अंत्येष्टि में भी उन्होंने भाग लिया और परिजनों को ढांढस बंधाया।

विकास के लिए संघर्ष

उन्होंने नवलगढ़ में किसान छात्रावास बनवाने के लिए अपनी जमीन दान की, झुंझुनूं जिले में बिजली और सड़क विस्तार करवाए, लोहार्गल को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करवाया और बड़ी रेल लाइन के लिए लगातार संघर्ष किया।

लेखक और विचारक

2008 में उन्होंने अपनी आत्मकथा घूमती जिंदगी: ढाणी से विधानसभा तक प्रकाशित की। इसमें राजनीतिक और सामाजिक संघर्षों से जुड़ी आंखों-देखी घटनाओं का उल्लेख है।

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