नई दिल्ली: केंद्रीय बजट 2026-27 में भारत सरकार ने विदेश नीति से जुड़े वित्तीय प्रावधानों में अहम बदलाव करते हुए बांग्लादेश को दी जाने वाली विदेशी विकास सहायता में 50% की कटौती कर दी है। वहीं रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह परियोजना के लिए इस बार कोई बजटीय आवंटन नहीं किया गया है। यह फैसला ऐसे समय पर सामने आया है, जब बांग्लादेश में हिंदू विरोधी घटनाओं और ईरान के साथ भारत के संबंधों पर बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव को लेकर चर्चाएं तेज हैं।
बांग्लादेश को मिलने वाली सहायता में सबसे बड़ी कटौती
केंद्रीय बजट दस्तावेजों के अनुसार भारत ने बांग्लादेश को दी जाने वाली विदेशी विकास सहायता को 120 करोड़ रुपये से घटाकर 60 करोड़ रुपये कर दिया है। यह कटौती भारत द्वारा किसी भी पड़ोसी देश को दी जाने वाली सहायता में सबसे बड़ी मानी जा रही है। अन्य पड़ोसी देशों के मुकाबले बांग्लादेश के लिए यह निर्णय द्विपक्षीय संबंधों में आए तनाव को दर्शाता है।
बजट आंकड़ों से यह भी सामने आया है कि 2025-26 में बांग्लादेश के लिए 120 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, लेकिन वर्ष के दौरान केवल 34.48 करोड़ रुपये ही खर्च हो सके। विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश में लगातार सामने आ रही हिंदू विरोधी हिंसा और हत्याओं की घटनाओं ने भारत की नीति को प्रभावित किया है।
भूटान, नेपाल और मालदीव को बढ़ी प्राथमिकता
जहां बांग्लादेश की सहायता में कटौती की गई है, वहीं भूटान, नेपाल, मालदीव और श्रीलंका को दी जाने वाली सहायता को या तो स्थिर रखा गया है या बढ़ाया गया है। इन चारों देशों के लिए कुल आवंटन बढ़ाकर 5,686 करोड़ रुपये कर दिया गया है, जो पिछले वर्ष के बजट अनुमान 5,483 करोड़ रुपये से लगभग 4% अधिक है।
भूटान इस सूची में सबसे बड़ा सहायता प्राप्त देश बना हुआ है। उसके लिए आवंटन लगभग 6% बढ़ाकर 2,289 करोड़ रुपये कर दिया गया है, जो जलविद्युत परियोजनाओं और आधारभूत संरचना विकास में भारत के निरंतर सहयोग को दर्शाता है।
चाबहार बंदरगाह परियोजना पर पूरी तरह वित्तीय रोक
केंद्रीय बजट 2026-27 में एक और बड़ा और चौंकाने वाला बदलाव चाबहार बंदरगाह परियोजना को लेकर सामने आया है। इस परियोजना के लिए इस बार कोई भी बजटीय प्रावधान नहीं किया गया है।
2024-25 में भारत ने चाबहार परियोजना पर 400 करोड़ रुपये खर्च किए थे। वहीं 2025-26 के बजट अनुमानों में पहले 100 करोड़ रुपये रखे गए थे, जिन्हें बाद में संशोधित कर 400 करोड़ रुपये कर दिया गया था। लेकिन 2026-27 में इस मद में आवंटन को पूरी तरह शून्य कर दिया गया है।
भारत–ईरान संबंधों पर बढ़ता वैश्विक दबाव
यह घटनाक्रम उस समय सामने आया है, जब भारत ने 2024 में ईरान के चाबहार स्थित शाहिद बेहेश्टी टर्मिनल के संचालन के लिए 10 वर्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। यह बंदरगाह भारत के लिए पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का अहम मार्ग माना जाता है।
सूत्रों के अनुसार चाबहार परियोजना पर फंडिंग रोकने के पीछे ईरान के साथ व्यापार को लेकर बढ़ता अंतरराष्ट्रीय दबाव एक बड़ा कारण है। अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा तेहरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25% टैरिफ लगाने की घोषणा के बाद पहले से मिली प्रतिबंधों में छूट भी प्रभावी रूप से सीमित हो गई है।
क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजनाओं पर अनिश्चितता
चाबहार परियोजना पर वित्तीय रोक से भारत की व्यापक क्षेत्रीय कनेक्टिविटी रणनीति पर सवाल खड़े हो गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से अफगानिस्तान और मध्य एशिया के साथ व्यापारिक और रणनीतिक संपर्कों पर असर पड़ सकता है।
हालांकि सरकार की ओर से इस पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है, लेकिन बजट संकेत साफ तौर पर यह दिखाते हैं कि भारत की विदेश सहायता नीति अब ज्यादा सतर्क और भू-राजनीतिक संतुलन पर आधारित होती जा रही है।





