Friday, February 13, 2026
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किशनगंज आर्मी कैंप विवाद: सीमांचल में सुरक्षा बनाम सियासत, क्या राष्ट्रीय हित पर भारी पड़ रही राजनीति?

पटना: बिहार के सीमांचल क्षेत्र का संवेदनशील जिला किशनगंज इन दिनों बड़े विवाद के केंद्र में है। बांग्लादेश बॉर्डर और सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास प्रस्तावित आर्मी कैंप को लेकर AIMIM के विरोध ने राष्ट्रीय सुरक्षा, किसान हित और राजनीति के टकराव को उजागर कर दिया है। सवाल उठ रहा है कि क्या यह विरोध सिर्फ जमीन का मुद्दा है या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक रणनीति छिपी है।

किशनगंज क्यों है रणनीतिक रूप से इतना अहम

किशनगंज जिला बांग्लादेश सीमा से सटा हुआ है और सिलीगुड़ी कॉरिडोर के बेहद करीब स्थित है, जिसे भारत की ‘चिकन नेक’ कहा जाता है। यही रास्ता उत्तर-पूर्व भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि यहां सेना की मजबूत मौजूदगी घुसपैठ, तस्करी और सीमा पार गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए बेहद जरूरी है।

आर्मी कैंप के खिलाफ AIMIM का धरना कैसे शुरू हुआ

एनएच-27 स्थित टाउन हॉल के सामने कोचाधामन के सकोर क्षेत्र में प्रस्तावित आर्मी कैंप के विरोध में एक दिवसीय धरना दिया गया। इस धरने में AIMIM विधायक सरवर आलम के साथ बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। प्रशासन ने मौके पर भारी पुलिस बल तैनात किया। विरोध की मुख्य वजह यह बताई गई कि जिस जमीन पर कैंप बनना है वह उपजाऊ है और गरीब किसान वहां खेती करते हैं।

किसान हित या राजनीतिक एजेंडा

धरने के दौरान सरवर आलम ने कहा कि किसानों की जमीन पर निर्माण उचित नहीं है और जिला प्रशासन को वैकल्पिक खाली जमीन का प्रस्ताव भेजना चाहिए। हालांकि उन्होंने सुरक्षा जरूरतों पर कोई साफ बयान नहीं दिया। वहीं विपक्षी दलों और स्थानीय लोगों का एक वर्ग मानता है कि यह विरोध राष्ट्रीय सुरक्षा को नजरअंदाज कर किया जा रहा है और इसे राजनीतिक रंग दिया जा रहा है।

सुरक्षा विशेषज्ञों की चेतावनी

सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि बांग्लादेश बॉर्डर और सिलीगुड़ी कॉरिडोर जैसे संवेदनशील इलाके में सेना के ढांचे पर सवाल उठाना खतरे की घंटी है। उनका मानना है कि भूमि विवाद का समाधान बातचीत से संभव है, लेकिन सेना की जरूरतों को राजनीति से दूर रखना चाहिए। ऐसे क्षेत्रों में स्थायी सैन्य मौजूदगी से सीमा की निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होती है।

स्थानीय लोगों की राय बंटी हुई

कई स्थानीय लोग मानते हैं कि आर्मी कैंप से इलाके में सुरक्षा बढ़ेगी और विकास को भी गति मिलेगी। कुछ किसान जमीन को लेकर चिंतित जरूर हैं, लेकिन वे खुले तौर पर धरने के समर्थन में सामने नहीं आए। इससे संकेत मिलता है कि विरोध पूरी तरह सर्वसम्मत नहीं है।

प्रशासन और केंद्र सरकार का अगला कदम

फिलहाल जिला प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। सूत्रों के मुताबिक आर्मी कैंप का चयन रणनीतिक अध्ययन और सुरक्षा आकलन के बाद ही किया गया है। आने वाले दिनों में प्रशासन और केंद्र सरकार का फैसला तय करेगा कि सुरक्षा को प्राथमिकता मिलेगी या राजनीतिक दबाव हावी रहेगा।

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