Tuesday, February 10, 2026
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UGC के प्रस्तावित नियमों पर देशभर में असंतोष, विप्र इंडिया के नेतृत्व में सर्वसमाज ने राष्ट्रपति के नाम सौंपा ज्ञापन

चिड़ावा: विप्र इंडिया वेलफेयर फाउंडेशन के बैनर तले सर्वसमाज ने उपखंड अधिकारी को राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रस्तावित नए UGC नियमों और विधेयक में बदलाव की मांग की। संगठन ने शिक्षाविदों, छात्रों, अभिभावकों और जागरूक नागरिकों की ओर से गंभीर आपत्तियाँ दर्ज कराते हुए इसे उच्च शिक्षा प्रणाली, विश्वविद्यालय स्वायत्तता और संवैधानिक समानता के सिद्धांतों के विरुद्ध बताया।

विप्र इंडिया वेलफेयर फाउंडेशन की ओर से सौंपे गए ज्ञापन में कहा गया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रस्तावित नए UGC नियम देशभर में शिक्षा जगत के लिए चिंता का विषय बन चुके हैं। संगठन का मत है कि ये नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत विभाजन को बढ़ावा दे सकते हैं और इससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता प्रभावित होने की आशंका है। ज्ञापन में यह भी रेखांकित किया गया कि प्रस्तावित नियम संविधान में निहित समानता के मूल सिद्धांतों के अनुरूप नहीं प्रतीत होते।

ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि देश में भारतीय न्याय संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता, एंटी रैगिंग नियम और SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम जैसे कठोर कानून पहले से प्रभावी हैं। ऐसे में उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए अलग से नए जातिगत नियम लाने की आवश्यकता पर गंभीर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। संगठन का मानना है कि नए प्रावधान मौजूदा कानूनों की भावना को दोहराने के बजाय शिक्षा परिसरों में भय का वातावरण बना सकते हैं।

विप्र इंडिया वेलफेयर फाउंडेशन ने अपने ज्ञापन में स्पष्ट किया कि यदि कोई छात्र किसी भी वर्ग के विरुद्ध जातिगत भेदभाव करता है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन झूठे या दुर्भावनापूर्ण आरोप लगाने वालों पर भी समान रूप से सख्त कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान होना आवश्यक है। संगठन ने याद दिलाया कि वर्ष 2012 के पूर्ववर्ती नियमों में झूठे आरोप सिद्ध होने पर दंड या जुर्माने का प्रावधान था, जिसे नए UGC नियमों में हटाया जाना गंभीर चिंता का विषय है।

ज्ञापन में यह तर्क भी रखा गया कि नए नियमों में यदि OBC वर्ग को भी पीड़ित पक्ष के रूप में शामिल किया गया है, तो इससे यह संदेश जाता है कि सामान्य वर्ग को पहले से ही दोषी मान लिया गया है। संगठन के अनुसार यह न्याय, निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है तथा इससे शिक्षा संस्थानों में आपसी अविश्वास बढ़ सकता है।

संगठन ने चेतावनी दी कि प्रस्तावित UGC नियम यदि वर्तमान स्वरूप में लागू किए गए तो शिक्षा संस्थानों में भय, असुरक्षा और आपसी तनाव का वातावरण बन सकता है। इससे शिक्षा का मूल उद्देश्य—ज्ञान, समानता और सामाजिक समरसता—प्रभावित होने की आशंका है। ज्ञापन में यह भी कहा गया कि जातिगत भेदभाव निस्संदेह घातक है, लेकिन निर्दोषों की सुरक्षा और निष्पक्ष जांच की गारंटी उतनी ही आवश्यक है।

ज्ञापन के माध्यम से विप्र इंडिया वेलफेयर फाउंडेशन ने राष्ट्रपति से आग्रह किया कि प्रस्तावित UGC नियमों और विधेयक को वर्तमान स्वरूप में लागू न किया जाए। संगठन ने शिक्षाविदों, छात्रों, सामाजिक संगठनों और विधि विशेषज्ञों के साथ व्यापक संवाद की मांग की, साथ ही किसी भी जांच समिति में सभी वर्गों के प्रतिनिधियों को शामिल करने पर जोर दिया। इसके अलावा कानून में पारदर्शिता, निष्पक्षता और दुरुपयोग रोकने के लिए स्पष्ट प्रावधान जोड़ने की भी मांग की गई।

ज्ञापन सौंपने के दौरान भाजपा के पूर्व जिला महामंत्री अमर सिंह तँवर, समाज चिंतक महेश शर्मा आजाद, मुलचंद नरहड़िया, सुभाष व्यास, एडवोकेट लोकेश शर्मा, पंडित सुनील शर्मा, सेवानिवृत्त विद्युत विभाग कर्मचारी मदन मोहन शर्मा और विप्र इंडिया वेलफेयर फाउंडेशन के अध्यक्ष अनिल शर्मा भारती मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े किसी भी कानून में संतुलन, न्याय और संवैधानिक मूल्यों का संरक्षण सर्वोपरि होना चाहिए।

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