जम्मू-कश्मीर: किश्तवाड़ में चल रहा ऑपरेशन त्राशी एक बार फिर सुर्खियों में है। इस आतंकरोधी अभियान में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान एक सैन्यकर्मी बलिदान हो गया, जबकि आतंकियों का बंकरनुमा ठिकाना ध्वस्त कर दिया गया। हालांकि, आतंकी घेराबंदी तोड़कर जंगलों में फरार होने में कामयाब रहे। यह 2026 में किश्तवाड़ की पहली बड़ी मुठभेड़ है, जिसने एक बार फिर जम्मू-कश्मीर आतंकवाद की चुनौती को उजागर कर दिया है।
क्या है ऑपरेशन त्राशी और क्यों है इतना अहम?
ऑपरेशन त्राशी किश्तवाड़ जिले में सक्रिय आतंकियों को खदेड़ने के लिए चलाया गया एक विशेष सैन्य अभियान है। इसका उद्देश्य जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े उन आतंकियों को खत्म करना है, जो बीते कुछ वर्षों से किश्तवाड़ को अपना नया गढ़ बना रहे हैं। इस ऑपरेशन में सुरक्षाबलों ने आतंकियों के उस ठिकाने को नष्ट किया, जिसे उन्होंने जंगल के बीच एक मिनी बंकर की शक्ल में तैयार किया था।
मुठभेड़ में बलिदान और आतंकियों का फरार होना
ऑपरेशन त्राशी के दौरान जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों द्वारा लगाई गई घात में एक सैन्यकर्मी बलिदान हो गया। सुरक्षाबलों ने आतंकियों के ठिकाने को पूरी तरह तबाह कर दिया, लेकिन आतंकी घेराबंदी तोड़कर भागने में सफल रहे। यह मुठभेड़ मौजूदा वर्ष में किश्तवाड़ में सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच पहली सीधी भिड़ंत मानी जा रही है।
जंगल में बना था बंकरनुमा ठिकाना
इस अभियान का सबसे चौंकाने वाला पहलू आतंकियों का ठिकाना रहा। यह कोई साधारण शरणस्थली नहीं, बल्कि पेड़ों के बीच एक पहाड़ी ढलान पर बनाया गया छोटा बंकर था, जो सैनिकों के निगरानी मोर्चों जैसा दिखता था। यहां लगभग छह महीने का राशन जमा था, जिससे साफ है कि आतंकी लंबे समय तक जंगल में टिकने की तैयारी में थे।

किश्तवाड़ में पाकिस्तानी और स्थानीय आतंकी नेटवर्क
सूत्रों के मुताबिक, किश्तवाड़ में सक्रिय आतंकियों में एक ओर जहांगीर सरुरी जैसे स्थानीय चेहरे हैं, वहीं बाकी अधिकांश आतंकी पाकिस्तानी बताए जा रहे हैं। सुरक्षा एजेंसियों को पकड़े गए ओवरग्राउंड वर्कर से मिली जानकारी के आधार पर कहा जा रहा है कि ये आतंकी इलाके की भौगोलिक परिस्थितियों से पूरी तरह वाकिफ हैं और जंगल वारफेयर, माउंटेन वारफेयर व गुरिल्ला वारफेयर में प्रशिक्षित हैं।
मोबाइल ऐप्स और हैंडलरों से संपर्क
आतंकी आम नागरिकों से तभी संपर्क करते हैं, जब उन्हें किसी खास जरूरत की पूर्ति करनी होती है। वे अपने हैंडलरों और ओवरग्राउंड वर्करों से कुछ खास मोबाइल ऐप्स के जरिए संपर्क बनाए रखते हैं। साजो-सामान जुटाने के लिए वे किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं रहते और अपने ठिकाने तक किसी को आने भी नहीं देते।
क्यों बन रहा है किश्तवाड़ आतंकियों का कॉरिडोर?
किश्तवाड़ की भौगोलिक बनावट आतंकियों के लिए मददगार साबित हो रही है। यह जिला डोडा, उधमपुर, कठुआ और कश्मीर घाटी के अनंतनाग से प्राकृतिक रास्तों के जरिए जुड़ा है। इसी कारण यह इलाका आतंकियों के लिए एक कॉरिडोर की तरह काम करता है, जहां से वे एक जिले से दूसरे जिले में आसानी से आवाजाही कर सकते हैं।
पिछले वर्षों की मुठभेड़ों का संकेत
बीते वर्षों में किश्तवाड़ और आसपास के इलाकों में कई बार आतंकी मुठभेड़ें हो चुकी हैं, जिनमें कभी सुरक्षाबलों को सफलता मिली तो कभी आतंकी भागने में कामयाब रहे। इन घटनाओं ने साफ कर दिया है कि यह इलाका अब पूरी तरह आतंकवाद मुक्त ।





