Sunday, March 22, 2026
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77वें गणतंत्र दिवस पर कर्तव्य पथ की परेड में छाई राजस्थान की झांकी, बीकानेर की उस्ता कला और कुप्पी बनी आकर्षण का केंद्र

बीकानेर: 77वें गणतंत्र दिवस पर नई दिल्ली के कर्तव्य पथ पर आयोजित भव्य परेड में राजस्थान की झांकी दर्शकों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण बनकर उभरी। बीकानेर की उस्ता कला, पारंपरिक रावणहट्टा वादन, गेर लोक नृत्य और मरु संस्कृति की जीवंत प्रस्तुति ने देश-विदेश से आए दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। खासतौर पर बीकानेर की उस्ता कला से बनी कुप्पी ने शाही शिल्पकला और परंपरा की अनूठी झलक पेश की।

बीकानेर की उस्ता कला बनी झांकी का मुख्य विषय

नई दिल्ली में आयोजित 77वें गणतंत्र दिवस परेड में राजस्थान की झांकी का विषय बीकानेर की विश्वविख्यात उस्ता कला रहा। इस झांकी ने अपनी बारीक शिल्पकला, पारंपरिक डिज़ाइन और जीवंत सांस्कृतिक प्रस्तुति के जरिए दर्शकों का मन मोह लिया। उस्ता कला को राजस्थानी शाही विरासत और पारंपरिक कारीगरी का प्रतीक माना जाता है।

रावणहट्टा वादन और 180 डिग्री घूमती प्रतिमा रही खास

झांकी के अग्र भाग में पारंपरिक लोक वाद्य रावणहट्टा का वादन करते कलाकार की 180 डिग्री घूमती प्रतिमा दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रही। इसके दोनों ओर उस्ता कला से सजी सुराही, कुप्पी और दीपक को आकर्षक फ्रेमों में सजाया गया, जिससे झांकी का यह भाग लगभग 13 फीट ऊंचा नजर आया और दूर से ही ध्यान खींचने में सफल रहा।

घूमती कुप्पी और कारीगरों की जीवंत प्रस्तुति

झांकी के ट्रेलर भाग में उस्ता कला से अलंकृत घूमती हुई पारंपरिक कुप्पी के साथ हस्तशिल्प पर कार्य करते कारीगरों के दृश्य प्रदर्शित किए गए। यह प्रस्तुति पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही उस्ता कला की परंपरा और पारंपरिक कौशल को जीवंत रूप में दर्शा रही थी।

ऊंट, ऊंट सवार और मरु संस्कृति की भव्य झलक

झांकी के पृष्ठभाग में विशाल ऊंट और ऊंट सवार की प्रतिमा राजस्थान की मरुस्थलीय संस्कृति, लोक जीवन और शाही विरासत का प्रभावशाली प्रतीक बनी। इसके साथ ही गेर लोक नृत्य प्रस्तुत करते कलाकारों ने राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान को और अधिक सशक्त रूप में प्रस्तुत किया।

उस्ता कला का इतिहास और जीआई टैग की पहचान

उल्लेखनीय है कि उस्ता कला ऊंट की खाल पर की जाने वाली स्वर्ण जड़ाई की पारंपरिक शाही कला है, जिसकी उत्पत्ति ईरान में मानी जाती है। मुगल काल में इस कला का विकास हुआ और महाराजा राय सिंह के शासनकाल में यह बीकानेर पहुंची। स्थानीय कारीगरों ने इसे विशिष्ट पहचान दी। इस कला में 24 कैरेट स्वर्ण पत्र और प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है। वर्तमान में इसका विस्तार लकड़ी, संगमरमर, कांच और दीवारों तक हो चुका है। बीकानेर की उस्ता कला को भौगोलिक संकेतक (जीआई टैग) भी प्राप्त है।

वीआईपी गिफ्ट बनी कुप्पी, कीमत सुनकर चौंक जाएंगे

राजस्थानी संस्कृति और उस्ता कला की कुप्पियां वीआईपी मेहमानों और विदेशी पर्यटकों के बीच प्रीमियम उपहार के रूप में लोकप्रिय हैं। सामान्य तौर पर 20 इंच की एक कुप्पी की कीमत लगभग 45 हजार से 50 हजार रुपये तक होती है। इसकी लोकप्रियता और कीमत की तुलना करें तो कई बार घर में एसी लगाना इस कुप्पी वाले शोपीस को खरीदने से सस्ता साबित होता है।

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