चिड़ावा: पंचायत समिति क्षेत्र में पंचायत पुनर्गठन को लेकर असंतोष थमने का नाम नहीं ले रहा है। ग्राम पंचायत बदनगढ़ के राजस्व गांव आलमपुरा को निर्वाचन क्षेत्र धत्तरवाला में शामिल किए जाने के फैसले के बाद गांव में भारी आक्रोश देखने को मिला। चौक पर एकत्र हुए ग्रामीणों के साथ भाजपा कार्यकर्ताओं ने भी खुलकर विरोध दर्ज कराया और स्थानीय भाजपा नेताओं के खिलाफ नारेबाजी करते हुए फैसले को जनभावनाओं के खिलाफ बताया। यह मामला अब पंचायत चुनाव से पहले राजनीतिक रूप से भी गरमाता नजर आ रहा है।
पंचायत समिति चिड़ावा की ग्राम पंचायत बदनगढ़ के अंतर्गत आने वाले राजस्व गांव आलमपुरा को निर्वाचन क्षेत्र संख्या 2 धत्तरवाला में जोड़े जाने के निर्णय से ग्रामीणों में रोष फैल गया। विरोध के दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण गांव के चौक पर एकत्र हुए और प्रशासनिक फैसले के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। ग्रामीणों का कहना है कि यह बदलाव न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि ग्रामीण हितों के भी विपरीत है।
ग्रामीणों ने बताया कि आलमपुरा गांव पूर्व में पंचायत समिति के निर्वाचन क्षेत्र संख्या 4 बदनगढ़ का हिस्सा रहा है और वर्तमान में भी ग्राम पंचायत बदनगढ़ का राजस्व गांव है। पंचायत मुख्यालय से इसकी दूरी एक किलोमीटर से भी कम है, जबकि जिस निर्वाचन क्षेत्र धत्तरवाला में गांव को जोड़ा गया है, उसकी दूरी करीब पांच किलोमीटर बताई जा रही है। इस कारण ग्रामीणों को प्रशासनिक कार्यों और पंचायत संबंधी सुविधाओं के लिए अतिरिक्त परेशानी उठानी पड़ेगी।
इस विरोध प्रदर्शन की खास बात यह रही कि इसमें भाजपा से जुड़े कार्यकर्ता भी शामिल रहे, जिन्होंने अपने ही दल के स्थानीय नेताओं के खिलाफ नाराजगी जाहिर की। कार्यकर्ताओं का कहना था कि जमीनी स्तर पर गांव की वास्तविक स्थिति को नजरअंदाज कर यह निर्णय लिया गया है। नारेबाजी के दौरान पंचायत पुनर्गठन को जल्द संशोधित करने की मांग जोर-शोर से उठाई गई।
ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि इस संबंध में उपखंड अधिकारी और जिला कलेक्टर को आपत्ति दर्ज करवाई जाएगी तथा आलमपुरा को पुनः बदनगढ़ निर्वाचन क्षेत्र में शामिल करने की मांग रखी जाएगी। ग्रामीणों ने यह भी चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर विचार नहीं किया गया तो आगामी पंचायत चुनाव में भाजपा को इसका राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
पंचायत पुनर्गठन से जुड़े ऐसे फैसले सीधे तौर पर ग्रामीण राजनीति, मतदान व्यवहार और विकास कार्यों को प्रभावित करते हैं। आलमपुरा प्रकरण ने यह साफ कर दिया है कि यदि स्थानीय जनभावनाओं को नजरअंदाज किया गया, तो इसका असर चुनावी समीकरणों पर भी पड़ सकता है।





